भारतीय लघुचित्र कला में संयोग श्रृंगार की अवधारणा, भावात्मक अभिव्यक्ति एवं सौंदर्यात्मक संरचना का संक्षिप्त परिचय

Authors

  • Jitendra Macchindranath Thorat Research Student, Department of Fine Arts, Nandalal Bose Subharti College of Fine Arts and Fashion Design, Swami Vivekananda Subharti University, Meerut, Uttar Pradesh, India Author
  • Sonal Bhardwaj Research Guide, Department of Fine Arts, Nandalal Bose Subharti College of Fine Arts and Fashion Design, Swami Vivekananda Subharti University, Meerut, Uttar Pradesh, India Author

DOI:

https://doi.org/10.66838/

Keywords:

भारतीय लघुचित्र कला, संयोग श्रृंगार, श्रृंगार रस, भारतीय सौंदर्यशास्त्, राधा-कष्ण चित्रण, रस सिद्धांत, दृश्य प्रतीकवाद

Abstract

भारतीय लघुचित्र कला भारतीय सांस्कृतिक विरासत की एक महत्वपूर्ण दृश्य परंपरा है, जिसमें धार्मिक, सामाजिक, साहित्यिक और भावनात्मक विषयों को सूक्ष्म रेखांकन, प्रतीकात्मक रंग योजना और सौंदर्यपूर्ण संरचना के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है। इस कला परंपरा में श्रृंगार रस को विशेष स्थान प्राप्त है, क्योंकि यह मानव भावनाओं, प्रेम, आकर्षण और सौंदर्य अनुभवों की सबसे व्यापक अभिव्यक्ति मानी जाती है। श्रृंगार रस के दो प्रमुख रूपों—संयोग श्रृंगार और विप्रलंभ श्रृंगार—में संयोग श्रृंगार प्रेमी युगल के मिलन, आनंद, अनुराग और भावनात्मक पूर्णता को प्रदर्शित करता है। प्रस्तुत समीक्षा लेख में भारतीय लघुचित्र कला में संयोग श्रृंगार की भावनात्मक एवं सौंदर्यशास्त्रीय अभिव्यक्तियों का विश्लेषण किया गया है।

इस अध्ययन में भारतीय सौंदर्यशास्त्रीय परंपरा, विशेष रूप से भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में प्रतिपादित रस सिद्धांत के संदर्भ में लघुचित्रों में प्रेम और सौंदर्य के चित्रण का अध्ययन किया गया है। राजस्थानी, पहाड़ी, मुगल और दक्कनी लघुचित्र शैलियों में राधा-कृष्ण प्रेम, नायक-नायिका संबंधों तथा राजदरबारी प्रेम दृश्यों के माध्यम से संयोग श्रृंगार की अभिव्यक्ति को समझने का प्रयास किया गया है। अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि लघुचित्र कलाकारों ने केवल बाह्य सौंदर्य का चित्रण नहीं किया, बल्कि चेहरे के भाव, नेत्रों की भाषा, शारीरिक मुद्राओं, रंग प्रतीकों, प्राकृतिक परिवेश और सजावटी तत्वों के माध्यम से आंतरिक भावनाओं को भी प्रभावशाली रूप से प्रस्तुत किया।

इस समीक्षा में यह भी विश्लेषण किया गया है कि किस प्रकार साहित्यिक ग्रंथों जैसे गीत गोविंद, रसिकप्रिया और कृष्ण भक्ति साहित्य ने लघुचित्रों के विषय, प्रतीकों और भावात्मक संरचना को प्रभावित किया। संयोग श्रृंगार भारतीय कला में लौकिक प्रेम और आध्यात्मिक अनुभूति के मध्य संबंध को भी दर्शाता है, जहाँ मानवीय प्रेम को उच्च सौंदर्य अनुभव के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

अध्ययन का निष्कर्ष है कि भारतीय लघुचित्रों में संयोग श्रृंगार केवल प्रेम का दृश्य चित्रण नहीं है, बल्कि यह भारतीय सौंदर्य दर्शन, सांस्कृतिक मूल्यों और भावनात्मक चेतना का एक महत्वपूर्ण कलात्मक माध्यम है। यह कला परंपरा आज भी भारतीय कला इतिहास और समकालीन सौंदर्य विमर्श में अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए है।

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Published

2026-10-03

How to Cite

भारतीय लघुचित्र कला में संयोग श्रृंगार की अवधारणा, भावात्मक अभिव्यक्ति एवं सौंदर्यात्मक संरचना का संक्षिप्त परिचय. (2026). FishTaxa - Journal of Fish Taxonomy, 38, 249-261. https://doi.org/10.66838/